जमशेदपुरः
देश के सबसे बड़े कारोबारियों में से एक टाटा संस के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा आज जन्म दिन है। वह आज अपना 85 वां जन्मदिन मना रहे हैं। उन्होंने देश के विकास के लिए कई बड़े कार्य किए हैं। हर कारोबारी से लेकर आम इंसान तक उनको अपना आदर्श मानता है। रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर, 1937 को मुंबई में नवल टाटा और सूनी टाटा के घर हुआ था। इतने सफल कारोबारी होने के बावजूद भी उन्होंने आज तक शादी नहीं की। उनको एक बार प्यार हुआ भी था लेकिन कुछ कारणों से वह शादी नहीं कर पाए थे। उनका बचपन अकेलेपन में बीता था। उनकी दादी ने उनका पालन-पोषण किया। एक बार रतन टाटा ने खुद कहा था, 'आप नहीं जानते कि अकेले रहना कैसा होता है? जब तक आप अकेले समय बिताने के लिए मजबूर नहीं होते, तब तक यह एहसास नहीं होगा। जब तक आप सचमुच में बूढ़े नहीं हो जाते, तब तक किसी को भी बूढ़ा होने का मन नहीं करता। जो खबरे और जानकारियां वेबसाईट्स पर हैं उसके मुताबिक रतन टाटा अपनी प्रेमिका के साथ विवाह बंधन में बंधने ही वाले थे कि उन्हें भारत लौटना पड़ा। उनकी दादी की तबीयत बिगड़ गई थी। रतन टाटा को लगा कि उनके प्यार में उनकी प्रेमिका भारत तक आ जायेगी लेकिन वर्ष 1962 में भारत-चीन की लड़ाई की वजह से उनके माता-पिता ने उन्हें नहीं आने दिया था। इसलिए दोनों का प्रेम अधूरा रह गया। टाटा को दो साल तक एक कंपनी में काम करने के दौरान लॉस एंजिल्स में प्यार हो गया था। उन्होंने अपने बचपन के बारे में भी बताया कि कैसे चीजें उनके लिए हमेशा आसान नहीं थी। उन्होंने बताया कि "मेरा बचपन खुशहाल था लेकिन जैसे-जैसे मेरा भाई, मैं बड़े होते गए। हमें अपने माता-पिता के तलाक के कारण रैगिंग और व्यक्तिगत परेशानी का सामना करना पड़ा, जो उन दिनों में उतना आम नहीं था जितना आज है। रतन टाटा ने बताया था कि उनके पिता नवल और मां सोनी टाटा का तलाक उस वक्त हो गया था जब वे महज 10 साल के थे। जब मेरी मां ने दोबारा शादी की, उसके तुरंत बाद स्कूल के लड़के हमारे बारे में हर तरह की बातें कहने लगे लेकिन, हमारी दादी ने हमें हर कीमत पर गरिमा बनाए रखना सिखाया। उन्होंने कहा कि मुझे आज भी याद है कि किस तरह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वह मुझे और मेरे भाई को गर्मियों की छुट्टियों के लिए लंदन लेकर चली गईं थीं। वास्तव में वहीं उन्होंने हमारे अंदर मूल्य डाले। वह हमें बताती थीं कि "ऐसा मत कहो या इस बारे में शांत रहो। रतन टाटा परोपकार और मानवता की भावना के बिना कारोबार का संचालन करने में भरोसा नहीं रखते हैं।

कैसा रहा उनका करियर
वह 1959 में आर्किटेक्चर और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग का अध्ययन करने के लिए कॉर्नेल विश्वविद्यालय गए और 1962 में भारत लौटने से पहले लॉस एंजिल्स में जोन्स और एम्मन्स के साथ छोटी अवधि के लिए काम किया था। रतन टाटा ने 1962 में टाटा स्टील की जमशेदपुर शाखा से पहले करियर की शुरुआत की थी, जिसके बाद वह 1975 में मैनेजमेंट की पढ़ाई करने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल चले गए थे। 1991, भारत के साथ टाटा ग्रुप के लिए काफी महत्वपूर्ण था। इस दौरान देश निजीकरण और उदारीकरण जैसे प्रमुख सुधार लागू हुए। वहीं, इसी वर्ष टाटा समूह के अध्यक्ष के रूप के पदभार संभाला था। रतन टाटा की लीडरशिप में इस दौरान टाटा ने भारत से बाहर निकल पूरे विश्व में फैल गया। आज टाटा ग्रुप नमक से लेकर ट्रक निर्माण के कारोबार में है। रतन टाटा की लीडरशिप में 2000 में टाटा ने टेटली के अधिग्रहण से शुरुआत करते हुए मात्र नौ वर्षों में 36 कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया था। इस दौरान उनकी नेतृत्व में टाटा स्टील की ओर से किए गए कोरस स्टील का अधिग्रहण और टाटा मोटर्स की ओर से लक्जरी कार कंपनी जगुआर और लैंड रोवर का अधिग्रहण सबसे प्रमुख माना जाता है। पिछले साल आई आईआईएफएल हुरुन इंडिया रिच लिस्ट में रतन टाटा की संपत्ति को 3500 करोड़ रुपये के करीब बताया गया था। इतनी संपत्ति के साथ वे देश के 433वें सबसे अमीर व्यक्ति हैं। रतन टाटा की संपत्ति कम होने की बड़ी वजह उनकी ओर से की जाने वाली परोपकारी गतिविधियां हैं। रतन टाटा को उड़ने का बहुत शौक है। वह 2007 में F-16 फाल्कन उड़ाने वाले पहले भारतीय बने। उन्हें कारों का भी बहुत शौक है। उनके संग्रह में मासेराती क्वाट्रोपोर्टे, मर्सिडीज बेंज एस-क्लास, मर्सिडीज बेंज 500 एसएल और जगुआर एफ-टाइप जैसी कारें शामिल हैं।90 के दशक में जब इंडिगो पहली बार लॉन्च किया गया तब कंपनी की सेल उम्मीदों के अनुरूप नहीं हो पाई। उस वक्त टाटा ग्रुप ने चुनौतियों से जूझ रही टाटा मोटर्स के पैसेंजर कार डिविजन को बेचने का फैसला लिया। इसके लिए रतन टाटा ने अमेरिकन कार निर्माता कंपनी फोर्ड मोटर्स के चेयरमैन बिल फोर्ड से बात की। बातचीत के दौरान बिल फोर्ड ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा था कि तुम कुछ नहीं जानते, आखिर तुमने पैंसेजर कार डिविजन शुरू ही क्यों किया? अगर मैं यह सौदा करता हूं तो यह तुम्हारे ऊपर एक बड़ा एहसान होगा। फोर्ड चेयरमैन के इन शब्दों से रतन टाटा बहुत आहत हुए पर उन्होंने इसे जाहिर नहीं किया। उसके बाद उन्होंने पैंसेजर कार डिविजन बेचने का अपना फैसला टाल दिया और अपने अंदाज में उनसे इसका बदला लिया। अमेरिकी तकनीकी दिग्गज आईबीएम के साथ नौकरी की पेशकश के बावजूद, टाटा ने भारत लौटने का फैसला किया और टाटा स्टील के साथ अपना करियर शुरू किया। उनके परिवार के सदस्य कंपनी के मालिक थे, पर उन्होंने एक सामान्य कर्मचारी के तौर पर कंपनी में काम शुरू किया। उन्होंने टाटा स्टील के प्लांट में चूना पत्थर को भट्ठियों में डालने जैसा काम भी किया। अपमान का बदला लेने के लिए रतन टाटा ने बिना कुछ कहे ही ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिससे फोर्ड चेयरमैन को अपना सुर बदलना पड़ा। मुंबई में रतन टाटा के ऑफर को स्वीकार करते हुए फोर्ड चेयरमैन बिल फोर्ड ने वही बातें अपने लिए कही जो कभी उन्होंने रतन टाटा का अपमान करते हुए कहा था। उस दौरान उन्होंने रतन टाटा को धन्यवाद करते हुए कहा, "आप जैगुआर और लैंड रोवर सीरीज को खरीदकर हमपर बड़ा एहसान कर रहे हैं।"